
इनसान हमेशा से पृथ्वी पर अपने अस्तित्व को बचाने के लिए प्रयासरत रहा है। विश्व के सभी प्रमुख धार्मिक ग्रंथों व धर्मों में प्रलय (विनाश) की अवधारणा तथा मनुष्य द्वारा उस विपत्ति से पार पाने का वर्णन मिलता है। चाहे नूह की कहानी हो या मनु की कहानी, सबमें एक बात समान मिलती है। प्रलय के पहले ही इस पृथ्वी के समस्त प्राणियों तथा सब प्रकार के वनस्पति बीजों को संरक्षित किया गया जिससे इस पृथ्वी पर पुन: सृष्टि की स्थापना हुई।
यह प्रयास किसी संभावित वैश्विक आपदा की स्थिति में होने वाली पर्यावरण की क्षति की भरपाई करने के लिए किया जा रहा है। किसी आपदा या बीमारी के चलते, जलवायु परिवर्तन या किसी अन्य कारण की वजह से अगर किसी क्षेत्र विशेष की वनस्पति प्रजातियों का सफाया हो जाता है तो इस स्थिति में ग्लोबल सीड वॉल्ट में संरक्षित बीजों से उस प्रजाति को लुप्त होने से बचाया जा सकता है। इसे डूम्स-डे वॉल्ट यानी कयामत के दिन खुलने वाली वॉल्ट कहा गया है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा सराही और समर्थित इस आर्कटिक ग्लोबल सीड वॉल्ट को एक त्रिपक्षीय संधि के अंतर्गत नार्वे सरकार, ग्लोबल क्रॉप डायवर्सिटी ट्रस्ट (जीसीटीडी) तथा नॉर्डिक जेनेटिक रिसोर्स सेंटर द्वारा चलाया जाता है। जीसीटीडी इसमें सबसे मुख्य भूमिका अदा करता है और बीजों को एकत्र करने से लेकर ग्लोबल सीड वॉल्ट तक पहुँचाने का काम करता है।
इस वॉल्ट के निर्माण में करोड़ों डॉलर का खर्च आया है। दरअसल इसको बनाने का विचार 1984 में एक अनुपयोगी कोयले की खदान में स्थापित हुए बैकअप नॉर्डिक जीनबैंक से आया, जहाँ अफ्रीका के गृहयुद्ध के चलते कृषि वैज्ञानिकों ने 300 से ज्यादा प्रकार की प्रजातियों के 10000 बीज जमा कराए थे।
इसके बाद वर्षों से दरकिनार किए गए कृषि विविधता संरक्षण के मुद्दे पर एक बार फिर विश्व का ध्यान गया और 19 जून 2006 को स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क तथा आइसलैंड के प्रधानमंत्रियों की मौजूदगी में एक समारोह में स्वॉलबर्ड ग्लोबल सीड वॉल्ट की नींव का पहला पत्थर रखा गया। 26 फरवरी 2008 को इस वॉल्ट ने आधिकारिक रूप से पूरी क्षमता के साथ बीज संरक्षित करना शुरू कर दिया।
उत्तरी ध्रुव से मात्र 1120 किमी दूर स्थित स्पिट्जबर्गन द्वीप के अलावा इस वॉल्ट को बनाने का बेहतर स्थान और कही नहीं हो सकता था। साल के चार महीने अंधेरे में डूबे रहने वाले इस द्वीप पर स्थित इस वॉल्ट में विश्वभर की कृषि विविधताओं को संरक्षित किया जा सकता है।
यह द्वीप समुद्री सतह से 130 मीटर ऊँचा है। इस वजह से भविष्य में अगर दुनिया की हिम टोपियाँ पिघल भी जाती हैं तब भी यह स्थान पानी में नहीं डूबेगा। यहाँ कोयला भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है जो रेफ्रिजरेशन मशीनों के ईंधन के काम आता है। यहाँ का औसत तापमान शून्य से -3.5 डिग्री सेल्सियस रहता है और इस वॉल्ट के अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप −18 डिग्री सेल्सियस पर बीज रखे जाते हैं। यहाँ पाए जाने वाले ध्रूवीय भालू भी इस वॉल्ट को एक प्राकृतिक सुरक्षा घेरा प्रदान करते हैं।
इस वॉल्ट को कुछ ऐसे बनाया गया है कि अगर किसी कारण से रेफ्रिजरेशन मशीन खराब हो जाए तो भी यहाँ रखे बीज सालों तक खराब नहीं होंगे। इस वॉल्ट में ठंडी आर्कटिक हवा के जरिए तापमान -10 डिग्री सेल्सियस पर स्थिर रखा जा सकता है, बिना किसी मानवीय सहायता के भी इस पद्धति से बरसों तक यहाँ तापमान को ठंडा रखा जा सकता है। अनुमान लगाया गया है कि किसी वैश्विक आपदा के बाद भी इस वॉल्ट में रखे बीज कई सौ साल तक खराब नहीं होंगे। कुछ प्रमुख बीज तो इस परिस्थिति में हजारों साल तक जी सकते हैं।
विकासशील देशों के परम्परागत जीनबैंकों में हमेशा डर बना रहता है कि जलवायु परिवर्तन, अकुशल प्रबंधन, युद्ध, राजनैतिक अस्थिरता या किसी अन्य कारण से अगर जीनबैंक अथवा उसमें रखे बीज नष्ट हो सकते हैं, ऐसी स्थिति में यह बीज ग्लोबल सीड वॉल्ट से हासिल किए जा सकते हैं। इस पृथ्वी पर लगभग 1400 किस्म की फसलों के बीज या नमूने इसी प्रकार के खतरों वाले देशों के जीनबैंकों में रखे हैं।
इस ग्लोबल वॉल्ट में कोई भी देश या संगठन ठीक उसी तरह बीज जमा कर सकता है जिस तरह बैंकों के सेफ डिपॉजिट में कोई वस्तु, किसी वित्तीय बैंकों की तरह काम करने वाली इस वॉल्ट में गए बीजों पर जमाकर्ता का पूर्ण अधिकार होता है।
इसके लिए जमाकर्ता को अंतरराष्ट्रीय नियमों के अंतर्गत विश्व कृषि संगठन के सभी नियम-शर्तों का पालन करना पड़ता है जिसमें से एक है किसी भी वैश्विक आपदा या संकट की स्थिति में यहाँ संरक्षित बीजों पर ग्लोबल क्रॉप डायवर्सिटी ट्रस्ट का अधिकार हो जाएगा और इसे विश्व संपदा माना जाएगा।
सभी संरक्षित बीजों को यहाँ रखने वाले देशों अथवा संगठनों को इस ग्लोबल सीड वॉल्ट से अपनी बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा, देशीय प्रजातियों को सहेजने का एक सुनहरा मौका मिलता है, साथ ही इस पृथ्वी को भी एक मौका मिलता है किसी भी अनहोनी के बाद एक नई शुरुआत करने का। उम्मीद है कि इस आपदा के पहले ही मनुष्य शायद सचेत हो जाए और इन बीजों को कभी इस्तेमाल करने की नौबत ही न आए।
चित्र सौजन्य - मेरी टेफरी/ग्लोबल क्रॉप डायवर्सिटी ट्रस्ट
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