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जूता बना विरोध का ब्रांड

आज आडवाणी पर भी चप्पल चल ही गई, कांग्रेस से हर मामले पर मोर्चा लेने वाली बीजेपी जूते-चप्पला फेंके जाने में भी समकक्ष हो गई| फर्क इतना है कि कांग्रेस के वर्तमान गृहमंत्री पर जूता फेंका गया जबकि भारतीय जनता पार्टी के भूतपूर्व गृहमंत्री रहे लाल्कृष्ण आडवाणी इसका शिकार बने| इस बार कोई पत्रकार नहीं बल्कि एक बीजेपी कार्यकर्ता द्वारा ही इस विरोध ब्रांड का इस्तेमाल किया|

आजकल के जमाने में सिर्फ ब्रांड चलता है, तेल,साबुन, कार, चढ्ढी-बनियान तक ब्रांड के नाम से ही बिकता है। राजनितिक पार्टियाँ भी ब्रांडेड प्रचार में भरोसा करने लगी है। इस ब्रांडबाजी के युग में जनमानस के मानसपटल पर ब्रांड का हौवा हावी हो गया है।

पिछले कई दशकों से नेताओं-मंत्रियों के जूते खा रही जनता को भी अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए एक अदद ब्रांड की जरूरत पड़ रही थी। बुश पर मारे गए जैदी के जूते से कई प्रदर्शनकारियों को एक पुराना पर नया तरीका मिल गया जिससे वे दुनिया का ध्यान अपनी और आकर्षित कर सकते हैं। ऐसे और 'हमले' हो गए तो सभी पत्रकार वार्ताओं में मन्दिरों की तर्ज पर पत्रकारों से जूते बाहर ही उतरवा लिए जाएँगे। हो सकता है कि कोई एंटी शू टास्क फोर्स भी गठित कर दी जाए।

आखिर इस ब्रांड की जरूरत मीडिया को भी थी, जनमानस के मुद्दों को दिखाने के बजाए कभी यू-ट्युब के वीडियो दिखाए जाते है तो कभी पैसा देकर बुलाए गए लोगो के जरिए पूवर्नियोजित मुद्दो पर आधारित मंच पर रटी-रटाई बहस दिखा अपने कर्तव्यों की इतिश्री मानने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया को सिर्फ सनसनी फैला कर ही इकट्ठा किया जा सकता है।

आज का मीडिया सिर्फ विवादों को ही खास खबर मानता है और किसी भूले-बिसरे मुद्दे को उठाने के लिए सिर्फ एक ही रास्ता बचता है कि किसी भी तरीके चाहे वो 'नैतिक' हो या 'अनैतिक' अपनी बात को लोगों के सामने लाने के लिए हंगामा बरपा दें।

जरनैल सिंह का यह जूता किसी धर्म का नहीं है, इस जूते का निशाना कांग्रेस-भाजपा या कोई धर्म या पार्टी नहीं है, यह जूता नरेन्द्र मोदी पर भी फेंका जा सकता है। यह जूता एक सिस्टम की नाकामी, हजारों पीडितों को न्याय न दिला पाने की व्यथा, 25 सालों के अपमान व गुस्से से भरा हुआ है।

आखिर 84 के सिख दंगों के आरोपी टाईटलर को क्लिनचिट दिए जाने से नाराज किसी सिख (यहाँ उल्लेख होना चाहिए कि पत्रकार भी होता तो इंसान ही है) ने अगर 25 साल मामले के खिंचने के बाद भी कुछ नहीं हो पाने पर नाराजी जाहिर कर दी तो कोई गुनाह नहीं हुआ, गनीमत है इस मामले में सिर्फ जूते ही चले, अगर कोई सिरफिरा 'तालीबानी तरीके' से विरोध दर्ज करता तब क्या होता?

करप्ट ब्यूरो ऑफ इंडिया यानी सीबीआई (किसी को बुरा लेगे तो माफी) के पास जितने भी केस गए आखिर क्या हुआ उनका, सालों-साल की तफ्तीश और मगजपच्ची के बावजूद अधिकतर मामलों मे कुछ नही हुआ। सत्ता की समर्थक बनी इस एजेंसी की विश्वसनीयता पर आए दिन प्रश्नचिन्ह उठने लगे है।

दरअसल जूता विरोध को ब्रांड के रूप में ख्याति तब मिली थी जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश पर एक इराकी पत्रकार ने जूता फेंका था। बुश पर जूता फेंकने वाला पत्रकार मुर्तजर अल जैदी रातोरात पूरी दुनिया में चर्चित हो गया। यही नहीं, बुश पर फेंके गए जूते की कीमत भी 50 करोड़ रुपए हो गई थी और वह दुनिया का सबसे कीमती जूता बन गया था।

इस विरोध ब्रांड को पहले भी इस्तेमाल में लाया जा चुका है चीन के प्रधानमंत्री वेन जिया बाओ पर भी उस वक्त जूता फेंका गया था, जब वे इंग्लैंड में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में भाषण दे रहे थे। यहाँ पर एक छात्र द्वारा चीनी प्रधानमंत्री पर जूता फेंका गया था लेकिन वह जूता मंच तक नहीं पहुँच पाया था।

रही बात नैतिकता की तो बहुत से नैतिकता का भाषण झाड़ने वाले अक्सर कंपनी पॉलिसीज के भले की सोच तमाम भले-बुरे काम कर बाद में नैतिक मूल्यों पर बड़ी-बड़ी बातें करते है। नेताओं, भ्रष्ट अफसरों को अक्सर सभी लोग कोसते है, गालियाँ देते है पर सामने आकर कहने की हिम्मत किसी में नहीं है, रोज़ की भागमभाग में इतना दम नहीं बचा कि कुछ बोलें। जरनैल सिंह के इस जूते ने कम से कम पीठ पीछे तो वार नहीं किया, सीधे सामने पूरे देश के सामने जूता मारा नहीं बल्कि विरोधस्वरूप फेंका। जिनको यह बदसलूकी लग रही है वो लोग कम से कम दंगापीडितों के साथ हुए अत्याचार और 25 सालों से न मिलने वाले न्याय के बारे में एक बार सोच भर लें।

रही बात पत्रकारिता को कलंकित करने की तो आज वास्तविकता यह है कि कई बड़े संस्थानों में पत्रकारिता सिर्फ कापी-पेस्ट का काम रह गया है। एक्सक्लूसिव खबरें पाने की होड़ और चुनाव में विज्ञापन पाने की लूट में आम लोग मीडिया के लिए सिर्फ और सिर्फ ग्राहक बन कर रह गई है। कहा जा सकता है कि भ्रष्ट नेता, भ्रष्ट अफसर और भ्रष्ट पत्रकार सब ही मिलकर जनता को जूते लगा रहे हैं।

प्रतिक्रियाएँ

Re: जूता बना विरोध का ब्रांड
जूता बना विरोध का ब्रांड टिप्पणी बेहद विचारवान लगी। कुछ जूतें आकर लगे और कुछ जूतें फेंकने की भी इच्छा हुई।
Re: जूता बना विरोध का ब्रांड
सटीक। जूता मार राजनीति की शुरुआत हो चुकी है। यह जनता की कुंठा है, जो अकर्मणय प्रशासन के खिलाफ भरी सभा में जूतमपेल हो रही है। इलैक्ट्रॉनिक्स मीडिया ने पत्रकारिता के नाम को बदनाम किया है। इंग्लैंड वाला संदर्भ ज्ञानप्रद और याद रखने योग्य है।
Re: जूता बना विरोध का ब्रांड
जरूरी समय पर लिखा गया एक जरूरी लेख। इसमें तीखापन भी है, कड़वापन भी है और विरोध को सही दिशा में समझने की एक संवेदनशील कोशिश भी। आप व्यंग्य भी करते हैं। यह दिलचस्प बन पड़ा है और विचारोत्तेजक भी। बधाई।
Re: जूता बना विरोध का ब्रांड
अच्छे विषय पर अच्छा लेख लिखने हेतु बधाई।
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