'द लिविंग प्लेनेट' नामक इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि प्राकृतिक संसाधनों का यह संकट मौजूदा वित्तीय संकट से कहीं ज्यादा बड़ा और गंभीर होगा। इस रिपोर्ट के मुताबिक अभी दुनिया का पूरा ध्यान आर्थिक मंदी पर लगा है मगर उससे भी बड़ी एक बुनियादी मुश्किल हमारे सामने आ रही है, वो है प्राकृतिक संसाधनों की भारी कमी की।
पिछले कुछ सालों के आँकड़ों के अध्ययन पर आधारित इस रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि हाल ही में छाई आर्थिक मंदी के दौर से शेयर बाजार में हुए अनुमानित 20 खरब डॉलर के नुकसान की तुलना अगर आप हर साल हो रहे 45 खरब डॉलर मूल्य के प्राकृतिक संसाधनों के नुकसान से करें तो यह आर्थिक संकट पर्यावरण हानि के आगे कहीं नहीं टिकता।
इस रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता इस बात की जताई गई है कि विश्व की 33 प्रतिशत आबादी पानी, हवा और मिट्टी का निर्ममता से इस्तेमाल कर रही है। इसके अलावा जंगल की तेजी से होती कटाई होने से पेड़ प्राकृतिक गति से बढ़ नहीं पा रहे हैं। पहले जरूरत की जो लकड़ियाँ एक ही पेड़ से मिल जाती थीं अब उसके लिए दो से तीन पेड़ काटे जा रहे हैं।
बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई जारी है और इसके मुकाबले पौधारोपण न के लगभग है, जिस वजह से भू-क्षरण की समस्या भी विकराल रूप लेने लगी है। वनों के कटने से वर्षा का अनुपात भी गड़बड़ा गया है, जिसके चलते कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ लगातार संसाधनों को कम कर रही हैं।
इसी तर्ज पर समुद्र में भी मछलियाँ भारी तादाद में पकड़ी जा रही हैं क्योंकि जिस गति से इनका शिकार हो रहा है उतनी तेजी से तो वे बढ़ भी नहीं पातीं। इस वजह से इनके प्रजनन पर सीधा-सीधा असर हो रहा है, नतीजतन पहले के मुकाबले अब छोटी तथा कम वजन वाली मछलियाँ मिल रही हैं।
ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से ग्लेशियरों और ध्रुवों से बर्फ पिघलनी तेज हो गई है, जिस वजह से भी महासागरों के पानी का तापमान बदला है। इसके दूरगामी परिणामों में मछलियों की कई प्रजातियों के खत्म हो जाने का खतरा बना हुआ है। इसके तत्काल प्रभाव का नतीजा हाल ही में सिडनी के पास समुद्र में एकाएक उमड़ आई करोड़ों जैली फिशों के रूप में देखा गया, जिससे पार पाने में ऑस्ट्रेलियाई सरकार को करोड़ों डॉलर खर्च करने पड़े।
वर्ल्ड वाइल्ड फंड के मुताबिक आर्थिक संकट के मामले में सारे नेता और कॉरपोरेट वैश्विक स्तर पर मिल-जुलकर काम करने के लिए तैयार हैं और जल्द से जल्द इस समस्या पर लगाम लगाना चाहते हैं पर पर्यावरण संबधी समस्याओं के लिए वे उतने जागरूक और सजग नहीं हैं। इस समस्या को दरअसल वित्तीय संकट से भी बड़े और दीर्घकालिक संकट के रूप में देखा जाना चाहिए व इससे निपटने के लिए व्यापक संसाधन जुटाने चाहिए। वर्ल्ड वाइल्ड फंड का कहना है कि आम लोग भी इस स्थिति में बदलाव के अभियान में भाग लेकर एक बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं।
'भविष्य की महाशक्ति' चीन भी अब यह मान चुका है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में अब वो अमेरिका के समकक्ष है। हालाँकि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के हिसाब से अगर जोड़ा जाए तो अमेरिका अब भी शीर्ष पर है। हमेशा की तरह विकसित और अधिक जनसंख्या वाले देश जैसे अमेरिका और चीन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने वाले देशों की सूची में शीर्ष पर आते हैं, जबकि अफगानिस्तान और मलावी जैसे अशिक्षित और गरीब देश इस सूची में सबसे नीचे हैं।
अगर अब भी विश्व बिरादरी इस संकट से सबक नहीं लेती तो आने वाले सालों में पृथ्वी के पर्यावरण को होने वाली हानि प्राकृतिक संसाधनों समाप्त कर देगी या फिर यह संसाधन जनसाधारण को अनुपलब्ध जरूर बना देगी, जो निकट भविष्य में ऐसे कई भयानक संकटों को जन्म देगी।
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