मुंबई हमले के बाद एक बार फिर यह सवाल हमेशा की तरह मुँह बाए खड़ा है कि आखिर जिस तरह का हमला मुंबई में हुआ है, उसकी तैयारी एक-दो दिन में या एक-दो सप्ताह में भी नहीं हो सकती। जिस पैमाने पर जितने आधुनिक और शक्तिशाली हथियारों से मुंबई को निशाना बनाया गया है उसके लिए कड़े प्रशिक्षण व सैन्य संरचना की आवश्यकता की जरूरत होती है। अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार इसका सीधा मतलब निकाला जा सकता है कि इस हमले के पीछे आईएसआई जैसी कोई खतरनाक गुप्तचर एजेंसी तथा अल कायदा जैसे खतरनाक आतंकवादी संगठन हैं।
आखिर क्या वजह है जो इस देश पर आतंकवादी हर बार बड़े से बड़ा हमला करने में कामयाब हो जाते हैं। अगर ध्यान से देखें तो इन सवालों के कुछ जवाब हमारे सामने ही मौजूद हैं। एक ब्रिटिश अखबार के मुताबिक 'विश्व की कई सुरक्षा एजेंसियों द्वारा ओबामा के शपथ ग्रहण करने से पहले एक बड़ा आतंकी हमला तय माना जा रहा था और भारत इसके लिए हमेशा से 'सॉफ्ट टारगेट' रहा है। भारत में कमजोर आंतरिक सुरक्षा संबंधी कानून और आतंकवादी हमले से निपटने की कोई ठोस योजना न होने से इस देश में आतंकवादियों द्वारा हमले करना आसान होता है।
अमेरिका के अखबार 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने देश को आतंकवादियों का आसान निशाना बनने देने के लिए भारतीय नेतृत्व को दोषी करार दिया है। भारत की खुफिया इकाइयों में कर्मचारियों और संसाधनों की कमी है। देश के राज्यों की पुलिस में समन्वय का अभाव है। देश का आतंक निरोधी कानूनी ढाँचा अपर्याप्त है, जिसके लिए देश का राजनीतिक नेतृत्व दोषी है।
बात चुभने वाली है पर सच्चाई यही है। लगातार आतंकी हमलों से जूझते देश में होना यह था कि राज्य पुलिस की खुफिया एजेंसियों तथा केंद्रीय गुप्तचर एजेंसियों द्वारा इस बारे में कोई पूर्व सूचना दी जाती। हालाँकि इस बारे में आशंका जताई गई थी कि आतंकी समुद्र के रास्ते हमला कर सकते हैं और यह बयान लगभग हर समाचार पत्र तथा समाचार चैनलों, वेबसाइट्स पर प्रमुखता से प्रकाशित हुआ था, पर हमेशा की तरह न तो राज्य सरकारों ने इस ओर ध्यान दिया और केंद्रीय एजेंसियाँ भी सिर्फ सूचना देकर अपने कर्त्तव्य से मुक्ति पा गईं।
हाल ही में गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने बयान दिया था कि आतंकवादी घटनाएँ इतनी नहीं हो रहीं, जितना प्रचार किया जा रहा है। अपने बयान की सत्यता को प्रमाणित करते हुए उन्होंने एनडीए सरकार के शासनकाल में हुए आतंकी हमलों के आँकड़े पेश करते हुए कहा था कि देश में जितने लोग आतंकवादी हिंसा में एनडीए के शासन में मारे गए हैं, उनकी तुलना में यूपीए सरकार के दौरान कम मौतें हुई हैं।
तकरीबन यही काम विपक्षी दल भी करते हैं। आज आतंकवाद पर राजनीति करने वाले सफेदपोश नेता हर हमले के बाद एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हुए ऐसे मौकों का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने में लग जाते हैं। वोटों की खातिर सिमी जैसे प्रतिबंधित संगठन तक की पैरवी करते यह नेता कैसे आतंकवाद से निपटेंगे, यह समझ से बाहर है। चाहे कंधार प्रकरण हो, संसद पर हमला हो या मुंबई पर हमला, कोई भी सरकार इस मोर्चे पर तो बुरी तरह विफल रही है।
दुनिया की भावी महाशक्ति माने जाने वाले 1 अरब से ज्यादा आबादी वाले भारत में अमेरिका या इसराइल की तरह कड़े फैसले लेने का साहस क्यों नहीं है? भारत में देश की सुरक्षा के नाम पर खिलवाड़ होता है, अलग-अलग लोगों के हिसाब से सुरक्षा नियम लागू किए जाते हैं, जबकि अमेरिका में सुरक्षा के लिए भारत के रक्षामंत्री तक के कपड़े उतरवा लिए जाते हैं।
सत्ता के मोह में मोहित राजनेताओं को कुर्सी के मोह और विशेषकर वोट की राजनीति ने कड़े फैसले लेने से हमेशा रोका है। संसद पर हमले का दोषी पाया गया अफजल गुरु फाँसी की सजा दिए जाने के बाद भी वोट बैंक के चक्कर में आज तक जिन्दा है। पिछले पाँच साल में 16 आतंकी घटनाओं में 800 से ज्यादा लोग अपनी जान गँवा चुके हैं। इन लगातार होते हमलों और निर्दोष लोगों को मरते देख अब लगता है अगर 13 दिसम्बर 2001 में आतंकी अपने उद्देश्य में कामयाब हो जाते और कुछ सांसद तथा राजनेता मारे जाते तो शायद आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। आतंकवाद से लड़ने के कई प्रस्ताव व सुधार एक ही दिन में पारित भी हो जाते और पास भी।
शायद ज्यादा आबादी होने का यही खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है कि A-Z सुरक्षा प्राप्त हमारे 'नेताओं' पर 10-20 देशवासियों के मरने का कुछ असर नहीं होता। हर आतंकी घटना को कुछ ही दिन में भुलाकर नई घटना होने पर ही जागने वाली सरकारें अपने राजनैतिक मतलब के लिए खुफिया एजेंसियों का दुरुपयोग करती हैं। उसके चलते इन एजेंसियों से कोई उम्मीद कर पाना बेमानी है।
यह सरकारें और नेता क्या आतंकवाद को रोकेंगे। जब अपने ही देशवासियों के खिलाफ लड़ने वाले राज ठाकरे, बाला साहेब ठाकरे, लालू यादव और मुलायम जैसे कितने ही नेता हैं जो सिर्फ और सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे के लिए राजनीति करते हैं। एक बिहारी युवक मुंबई में मारा जाता है तो सारे बिहार के नेता एकजुट हो प्रधानमंत्री पर कार्रवाई का दबाव बनाते हैं। महाराष्ट्र सरकार की कमजोरी इस बात से ही जाहिर होती है कि एक अदने से दल के क्षेत्रीय नेता राज ठाकरे को गिरफ्तार करने से पहले मुख्यमंत्री को 1000 बार सोचना पड़ता है। आज भारत बाद में आता है, पहले 'जय महाराष्ट्र' या 'मेरा बिहार' आता है।
कुल मिलाकर लोकतंत्र की कीमत आम नागरिकों से लेकर जिम्मेदारी से अपना काम करते पुलिस और सेना के अधिकारियों तथा जवानों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। जहाँ इन नेताओं को देखकर अब कोई उम्मीद नहीं बची है, वहीं देश की रक्षा में लगे सिपाहियों को बिना बुलेटप्रूफ जैकेट, पुरानी राइफलें ले आतंकियों से लोहा लेते देख लगता है अब भी कहीं कोई मौजूद है, जिस पर भरोसा बचा है।
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