Welcome, Guest   [ Register | Sign In | Take a tour | Adult Filter: On ]

सलाम ! सैम बहादुर

सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ

अदम्य साहस और युद्धकौशल के लिए मशहूर, भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णिम दस्तखत करने वाले अमृतसर में जन्मे भारत के सबसे ज्यादा चर्चित और कुशल सैनिक कमांडर पद्मभूषण, पद्मविभूषण फील्ड मार्शल सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ (3 अप्रैल 1914) के जीवन और उपलब्धियों को ब्लॉग पर बयान करना थोड़ा मुश्किल होगा।

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने भारत के लिए कई महत्वपूर्ण जंगों में निर्णायक भूमिका निभाई थी, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है - 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ जीत, जिसका सेहरा उनके सिर ही बाँधा जाता है। तब से सैम बहादुर के नाम से मशहूर फील्ड मार्शल मानेकशॉ राष्ट्रीय महानायक के रूप में देखे जाते हैं।

90 से भी ज्यादा वसंत देख चुके के सैम बहादुर पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी है- 'इन वार एंड पीस : द लाइफ ऑफ फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ' यह फिल्म दादा द्वारा अपने पोते को बताए गए किस्से पर आधारित है, जिसमें दादा यानि सैम मानेकशॉ अपने पोते को भारत के कुछ यादगार ऐतिहासिक पलों के बारे में जानकारी देते हैं।

पहली लड़ाई
17वी इंफेंट्री डिवीजन में तैनात सैम ने पहली बार द्वितीय विश्वयुद्घ में जंग का स्वाद चखा, बर्मा अभियान के दौरान सेतांग नदी के तट पर जापानियों से लोहा लेते हुए सैम गम्भीर रुप से घायल हो गए, पेट मे कई गोलियाँ लगने पर उनका बचना लगभग नामुमकिन हो गया था। उन्हें गम्भीर अवस्था में रंगून के सैनिक अस्पताल में लाया गया, जब एक सर्जन ने उनका ऑपरेशन करने से पहले उनसे पूछा "what happen to you" तो उन्होने हँसते हुए कहा "I was kicked by a bloody mule!" उनकी दिलेरी से प्रभावित हो सर्जनने कहा "Given your sense of humour, it will be worth saving you!"

उनके अदम्य साहस से प्रभावित बर्मा मोर्चे के कमांडिंग आफिसर मेजर जनरल डी.टी. कॉवन ने उन्हें जीवन-मृत्यु से संघर्ष करते देख अस्पताल के बिस्तर पर ही स्वयं का मिलिट्री क्रास उन्हें प्रदान करते हुए कहा 'मरने के बाद पदकों का कोई मोल नहीं होता।'

इम्तिहान की घड़ी
परंतु मौत को चकमा देकर, सैम पहले स्टाफ कॉलेज क्वेटा, फिर जनरल स्लिम्स की 14वीं सेना के 12 फ्रंटियर राइफल फोर्स में लेफ्टिनेंट बनकर बर्मा के जंगलो में एक बार फिर जापानियों से दो-दो हाथ करने जा पहुँचे, यहाँ वे भीषण लड़ाई में फिर से बुरी तरह घायल हुए, द्वितीय विश्वयुद्घ खत्म होने के बाद सैम को स्टॉफ आफिसर बनाकर जापानियों के आत्मसमर्पण के लिए इंडो-चायना भेजा गया जहां उन्होंने लगभग 10000 युद्घबंदियों के पुनर्वास में अपना योगदान दिया।

1946 में वे फर्स्ट ग्रेड स्टॉफ ऑफिसर बनकर मिलिट्री आपरेशंस डायरेक्ट्रेट में सेवारत रहे, विभाजन के बाद 1947-48 की कश्मीर की लड़ाई में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सैम को नागालैंड समस्या को सुलझाने के अविस्मरणीय योगदान के लिए 1968 में पद्मभूषण से नवाजा गया ।

7 जून 1969 को सैम मानेकशॉ ने जनरल कुमारमंगलम के बाद भारत के 8वें चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का पद ग्रहण किया, उनके इतने सालों के अनुभव के इम्तिहान की घड़ी तब आई जब हजारों शरणार्थियों के जत्थे पूर्वी पाकिस्तान से भारत आने लगे और युद्घ अवश्यंभावी हो गया, दिसम्बर 1971 में यह आशंका सत्य सिद्घ हुई, सैम के युद्घ कौशल के सामने पाकिस्तान की करारी हार हुई तथा बांग्लादेश का निर्माण हुआ, उनके देशप्रेम व देश के प्रति निस्वार्थ सेवा के चलते उन्हें 1972 में पद्मविभूषण तथा 1 जनवरी 1973 को फील्ड मार्शल के मानद पद से अलंकृत किया गया।

तख़्ता पलट नहीं
हर योद्घा के साथ कई रोचक किस्से और रोमांचक वाकये जुड़े होते हैं और सैम बहादुर भी इसके अपवाद नहीं रहे हैं। यह किस्सा तो आज भी याद किया जाता है कि कैसे 1971 की लड़ाई के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें पूछा कि ऐसी चर्चा है कि आप मेरा तख़्ता पलटने वाले हैं, सैम ने अपने जिन्दादिल अंदाज में कहा, 'क्या आपको नहीं लगता कि मैं आपका सही उत्तराधिकारी साबित हो सकता हूँ? क्योंकि आप ही की तरह मेरी भी नाक लंबी है।'

और फिर सैम ने कहा, 'लेकिन मैं अपनी नाक किसी के मामले में नहीं डालता और सियासत से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं और यही अपेक्षा मैं आप से भी रखता हूँ।'

साहस के प्रशंसक
1971 की जंग के दौरान पाकिस्तानी सेना के कैप्टन मलिक की बहादुरी से प्रभावित सैम ने सार्वजनिक रुप से उनके साहस की सराहना की थी तथा पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या खान से उनके लिए पदक तक की सिफारिश कर डाली। 4 दशकों तक देश की सेवा करने के बाद सैम बहादुर 15 जनवरी 1973 को फील्ड मार्शल के पद से सेवानिवृत्त हुए।

सैम को आज तक इस बात का मलाल है कि शिमला समझौते के दौरान भारत सरकार ने कश्मीर समस्या सुलझाने का सुनहरा मौका हाथ से जाने दिया|

सैम अब एकांत की जिंदगी बसर करना चाहते हैं, वर्तमान में चल रही लड़ाईयों पर प्रतिक्रिया पर सैम कहते हैं, 'मैं तो शांतिप्रिय आदमी हूँ। इन सब बातों के बारे में कुछ नहीं जानता' लेकिन सभी जानते हैं कि इस रणबांकुरे के पास आज की पीढी को सुनाने के लिए ढेरों मिसालें हैं।

प्रतिक्रियाएँ

Re: सलाम ! सैम बहादुर
अच्छा है संदीप, आपने पुराने यादें ताजा कर दीं। मैं मॉनेकशॉ का बचपन से फैन हूँ। कोई २० बरस पहले इनके किस्से और इनपर स्टोरीज इंडिया टुडे में पढ़ा करता था। ये भारत के इकलौते फील्ड मार्शल भी हैं। १९७१ युद्ध के लिए ये हमेशा याद रखे जाएँगे क्योंकि इतिहास में एेसी बहुत कम लड़ाईयाँ हुई हैं जब किसी एक देश ने अपने दुश्मन देश के दो टुकड़े कर दिए हों और एक अलग राष्ट्र का ही निमार्ण कर दिया हो, जैसे हमने पाकिस्तान के साथ करके बांग्लादेश बना दिया। इस सुपर सोल्जर के बारे में बताने के लिए धन्यवाद।
Re: सलाम ! सैम बहादुर
i have no words for this great personality,i just want to say"he was great,is great and will be great always. i am his big fan.
Re: सलाम ! सैम बहादुर
संदीपजी, एक ऐसे समय में जब हम अपने नकली और अहंकारी नायकों के तुच्छ आभामंडल से प्रभावित होकर इन्हें अपना सब कुछ मान बैठे हों तब हमारे स्वर्णिम इतिहास के एक बहादुर लेकिन विवेकशील सेना नायक को याद करना बहुत मायने रखता है। आपके इस स्मरणीय ब्लॉग में मुझे दो बातें बहुत ही गहराई से छू गईं। अकसर ऐसा होता है कि किसी भी युद्ध में दुश्मन के लिए जरा-सी भी हमदर्दी औऱ सम्मान नहीं बच रहता है। ऐसे में मानेकशा ने पाकिस्तान सैनिक मलिक की बहादुरी की कद्र की यह मानेकशा जैसा विवेकशील सेना नायक ही कर सकता है। दूसरा किस्सा बर्मा के सेना नायक कॉवन का जिन्होंने मानेकशा की बहादुरी की कद्र करते हुए और उन्हें मैडल देते हुए कहा कि मरने के बाद पदकों का कोई मोल नहीं होता। यह एक सैनिक का सैनिक के प्रति प्यार औऱ सम्मान ही है और यदि इसे बहुत ध्यान से पड़ा जाए तो इसके दूसरे अर्थ भी निकलते हैं। मैंने कॉवन के इस वाक्य जब दूसरी बार पढ़ा तो मुझे लगा इसमें एक सैनिक का बहुत गहरा अवसाद और दुःख भी है कि सैनिक को जीते जी वह सम्मान शायद कई बार नहीं मिल पाता है जिसका वह जीते जी हकदार होता है। मुझे जनरल कॉवन के उस वाक्य में सैनिक का प्यार, अवसाद और दुःख एक साथ किसी मैडल की तरह ही झिलमिलता हुआ लगा। आप और हमारी पीढि़यां शायद ऐसे सेना नायकों के बारे में थोड़ा बहुत जानती-समझती और लिखती-पढ़ती है लेकिन यह सोचते हुए मैं चिंता में पड़ जाता हूं कि आने वाले पीढि़यां क्या इन असल नायकों को याद रख पाएगी?
अस्वीकरण