Webdunia: Portal - Search - Mail - Greetings   More >>
Support | Font Download | Feedback
Search  
Welcome, Guest  [ Register | Sign In ]

दर्दनाशक 'दवा' से खत्म होते गिद्ध

भारत में गिद्धों को बचाने की थकी हुई कोशिश

प्रकृति ने हर प्राणी को एक नियम के तहत बनाया गया है, हर प्राणी को एक नियत जिम्मेवारी दी गई है, प्रकृति के इस चक्र में साफ-सफाई का काम करने वाले गिद्दों की संख्या पिछले एक दशकों में एकाएक घट गई है, लगभग सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में विलुप्त हो रहे गिद्धों को बचाने के लिए भारत सरकार ने प्रयास शुरु कर दिए हैं। इसके तहत पशुओं को दी जाने वाली उस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया है जिसके कारण गिद्धों की मौत हो रही थी। संरक्षण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले 12 सालों में गिद्धों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से 97% की कमी आई है और वे विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गए हैं।

इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है कि पशुओं को दर्दनाशक के रुप मे एक दवा डायक्लोफ़ेनाक दी जाती है और इस दवाई को खाने के बाद यदि किसी पशु की मौत हो जाती है तो उसका माँस खाने से गिद्धों मर जाते हैं। भारत, पाकिस्तान और नेपाल में हुए सर्वेक्षणों में मरे हुए गिद्धों के शरीर में डायक्लोफ़ेनाक के अवशेष मिले हैं। उपचार के बाद पशुओं के शरीर में इस दवा के रसायन घुल जाते हैं और जब ये पशु मरते हैं तो उनका मांस खाने वाले गिद्धों की किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचता है, जिससे वे मौत का शिकार हो जाते हैं। इन्हीं कारणों से भारत में गिद्धों की संख्या तेजी से कम हो रही है।

साथ ही शहरी क्षेत्रो में बढता प्रदूषण, कटते वृक्षों से गिद्धो के बसेरे की समस्या भी इस शानदार पक्षी को बड़ी तेजी से विलुप्ती के कगार पर धकेल रही है, वैसे भी भारतीय समाज में गिद्धो को हेय दृष्टि से देखा जाता है, मरे हुए प्राणियों का माँस नोचने वाले इस पक्षी को सम्मान या दया की दृष्टि से नही देखा जाता है। मुर्दाखोर होने की वजह से गिद्ध पर्यावरण को साफ-सुथरा रखते है और सडे हुए माँस से होने वाली कई बिमारियों की रोकथाम में सहायता कर संतुलन बिठाते है।

ब्रिटेन के रॉयल सोसायटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड्स में अंतरराष्ट्रीय शोध विभाग के प्रमुख डेबी पेन का कहना है कि गिद्धों की तीन शिकारी प्रजातियाँ चिंताजनक रुप से कम हुई हैं, उनका कहना है, "हालांकि अब भारत में डायक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन भोजन चक्र से इसका असर ख़त्म होने में काफ़ी वक़्त लगेगा"। गौरतलब है की टनों की संख्या के यह दवा गाँव-शहरो में उपलब्ध है, निरक्षरता और इस सम्बन्ध में कोई समुचित जानकारी नही होने से इस पर लगाए गए प्रतिबन्ध इतनी जल्दी असरदार साबित होंगे इसमें शक लगता है।

रेगिस्तानी इलाकों के मुख्यतया पाए जाने वाले गिद्धों की संख्या सिर्फ गुजरात में ही 2500 से घटकर 1400 रह गई है। कभी राजस्थान व मध्यप्रदेश में भी गिद्ध भारी संख्या में पाए जाते थे, लेकिन अब बिरले ही कही दिखाई देते हों। गिद्धों की जनसंख्या को बढ़ाने के सरकारी प्रयासों को मिली नाकामी से भी इनकी संख्या में गिरावट आई है।

इनकी प्रजनन क्षमता भी संवर्धन के प्रयासों में एक बड़ी बाधा है, गिद्ध जोड़े साल में औसतन एक ही बच्चे को जन्म देते हैं। । भारत मे कभी गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती थी : बियर्डेड, इजिप्शयन, स्बैंडर बिल्ड, सिनेरियस, किंग, यूरेजिन, लोंगबिल्ड, हिमालियन ग्रिफिम एवं व्हाइट बैक्ड। इनमें से चार प्रवासी किस्म की हैं।

पर्यावरण में गिद्धों की भूमिका
पर्यावरण के संतुलन में गिद्धों की बड़ी भूमिका है, सदियों से ये गिद्ध ही मरे हुए जानवरों के अवशेषों को खा कर देखा जाए तो धरती पर पडी गन्दगी को ख़त्म करते रहे हैं जिससे बहुत सी बिमारियाँ व संक्रमण की रोकथाम होती है। प्राकृतिक रूप से भोजन चक्र में गिद्धों की भूमिका अहम रही हैऔर खाद्य श्रंखला में उनका महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन पिछले एक दशक में गिद्ध प्रजाति लुप्त होने की कगार पर पहुँच गई है।

संरक्षण के लिए उठाए गए कदम
पशुओं के इलाज के दौरान उन्हें दी जाने वाली दर्द निवारक दवा डायक्लोफेनिक ही गिद्धों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, यह बात आज से करीब दो दशक पहले ही उजागर हो गई थी। डायक्लोफेनिक से गिद्धों की मौत होने की जानकारी करीब 18 साल पहले ही मिल गई थी, लेकिन तब से लेकर आज तक गिद्धों में दवा के असर को कम करने का कोई तरीका ढूंढ़ा नहीं जा सका है। भारत सरकार भी हाल ही में हुए सर्वेक्षणों की रिपोर्ट आने के बाद मान गई कि इस दवाई के कारण ही गिद्धों की मौत हो रही है| नतीजतन भारत सरकार से संबद्ध नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ़ ने डायक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की थी जिसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वीकार कर डायक्लोफ़ेनाक की जगह दूसरी दवाइयों के उपयोग को मंज़ूरी दे दी।

इस आलेख में कुछ उद्धरण रॉयल सोसायटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड्स तथा भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 2008 की समीक्षा से लिए गये है।

प्रतिक्रियाएँ

Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
Thanks for such a wonderful information
Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
संदीप जी नि:संदेह आपने गंभीर मुद्‍दा उठाया है। गिद्ध जो कि गाँव-देहात में मरे हुए मवेशियों और जानवरों का माँस खाकर एक तरह से प्रदूषण और बीमारियों से ही बचाता है। लेकिन, अब यह 'गिद्ध प्रवृत्ति' मनुष्य में गहरे तक पैठ कर गई है, जिससे न सिर्फ गिद्ध बल्कि अन्य पशु-पक्षियों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। यदि इस प्रवृत्ति पर शीघ्र ही रोक नहीं लगी तो पशु-पक्षी किताबों तक ही सिमटकर रह जाएँगे। इस पर रोक लगाने के लिए 'जंगल प्रेमियों' को एकजुट प्रयास करने की जरूरत है।
Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
ये सरकार निकम्मी है, जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बदलनी है। इस दौर में जहाँ इंसानों की खबर नहीं ली जाती, उसमें गिद्दों पर ध्यान कौन देगा। हाँ अगर किसी सेलिब्रिटी के हाथों कोई गिद्द गलती से मर जाएगा तो मेनका गाँधी जैसे लोग उस पर राजनीति करने जरूर आ जाएँगे। ‍बेजुबान गिद्द के लिए अपने ब्लाग पर आवाज उठाने के लिए आपको साधुवाद।
Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
आपकी चिंता आपकी संवेदनशील सोच की परिचायक है। ना जाने कब तक ये मासूम पंछी मनुष्य के षडयंत्र का शिकार होते रहेंगें और हम खामोश देखते रहेंगें।
Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
संदीप, बहुत अच्छा मुद्दा है। यह बात तकरीबन पाँच साल पहले आना शुरू हुई थी जब प्रसिद्ध पर्यावरण फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर माइक पांडे ने इसपर एक फिल्म बनाई थी। यह फिल्म डिस्कवरी चैनल पर प्रसारित भी की गई थी। दो दशक पहले भारत में ८० लाख गिद्ध थे लेकिन अब इनकी संख्या घटकर मात्र १० हजार पहुँच गई है। इंसान हमेशा से ही पर्यावरण संतुलन बिगाड़ता रहा है। हालांकि अभी तक उसे इस बात का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ा है लेकिन प्रकृति की लाठी में भी भगवान की लाठी की तरह आवाज नहीं होती इसलिए जिस दिन यह नतीजा भुगतेगा उस दिन उस घटना का इतिहास लिखने वाले लोग भी नहीं बचेंगे। फिलहाल गिद्ध हो या बाघ सभी इंसानी लालच का शिकार हो रहे हैं। देखना यह है कि इंसान के हाथों प्रकृति अपना दोहन कब तक सहन करती है.......!!!!
Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
आपने बिल्कुल सही मामला उठाया है:::: कई बार मुझे लगता है कि मनुष्य प्रकृति की उत्कृष्ट रचना हो ही नहीं सकता.... क्योंकि प्रकृति के संतुलन को बूरी तरह से बिगाड़ने वाला सबसे बड़ा कारक मनुष्य ही है। दोष न सरकार का नहीं, दोष उस आम आदमी का है जो जब तक मरने की कगार तक न पहुँचे गूंगा, बहरा और निष्क्रिय बना रहता है। और उसकी यह निष्क्रयता और खामोशी स्वयं उसके समूल नाश का कारण बनती है।
Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
संदीपजी, आपका लेख एक बार फिर यह बताता है कि हम जिस दुनिया को सुंदर कहते नहीं अघाते उसमें हमने जीव-जंतुअों को मारने के तमाम इंतजाम कर लिए हैं। यह मुद्दा सिर्फ पर्यावरण से ही ताल्लुक नहीं रखता है, हमारे जीवन और संस्कृति से भी ताल्लुक रखता है। यदि आपको याद हो तो कुछ समय पहले फ्रंटलाइन में एक बहुत ही मार्मिक स्टोरी छपी थी कि मुंबई में गिद्ध खत्म होने के कारण पारसियों को एक बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा। पारसियों में यह मान्यता है कि मृत व्यक्तियों को गिद्धों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता है। पारसियों में ऐसा माना जाता है कि मरने के बाद भी मनुष्य को इस धरती के लिए उपयोगी बने रहना चाहिए। जाहिर है इसका ताल्लुक संस्कृति से है। लेकिन मैं सोचता हूं कि गिद्ध का खत्म होना मेरे लिए एक तेज निगाह का खत्म होना है। गिद्धों को साहित्य औऱ जीवन में भी भले ही खूंखार बताया गया हो लेकिन हम जानते हैं कि ये हमारे जीवन के लिए भी कितने जरूरी हैं।
Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
कई बार आपके लेखों में मैने पर्यावरण, जीव-जंतु और इस प्रकति के लिए एक अजीब सी बैचेनी अनुभव की है जो आपके मन मे प्रकति के लिए लगातार चल रहे विचारो से लड़कर आती है और वही बैचेनी शब्‍दों को पहन कर एक आदर्श लेख बन जाती है। मुझे शर्म आती है कि हम अपनी दिली, दिमागी और जिस्‍मानी खूराकों के लिए कविताएँ, कहानियाँ और कल्‍पनाएँ गढ़ते है जबकि जरूरत है ऐसे आदर्श लेखों की जो शहर और जंगल दोनो जगह आदर्श की स्‍थापना कर सके। मैं कोशिश करुँगा कि आप की तरह की मनोस्थ्‍ाति पैदा कर इस तरह के लेख्‍ा का सौवाँ हिस्‍सा लिखूँ। आपको साधुवाद । नवीन रांगियाल
Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
आपने बिल्कुल सही विषय उठाया है। आज सिर्फ गिद्ध ही नहीं ब्लकि सैंकडों की स्ख्या में जीव और पेड पौधों की प्रजातियां रोज खत्म होती जा रही हैं। उन्हें बचाने की जरुरत है। अच्छा लगा आपका ब्लाग देखकर कि कोई है जो पर्यावरण पर लिख रहा है।
Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
संदीप जी नमस्कार, मैं जगमोहन बरूआ पिछले 15 सालों से असम और पूर्वोत्तर के वन जीवों और वनों के संरक्षण पर आवाज उठाता रहा हूँ, आपके इस लेख से मैं बहुत प्रभावित हुआ| आपसे निवेदन है कि कभी हमारे जंगलो के बारे में भी ब्लॉग लिखें, अधिक जानकारी के लइए मुझे ईमेल करें मेरा पता है jag_barua@yahoo.co.in
Re: दर्दनाशक दवा से खत्म होते गिद्ध
very good article, thanks to the author to bring on such topic... Maya Tyagi, Lucknow, UP
अस्वीकरण